
कॉकरोच जनता पार्टी के दोनों नेताओं को दिल्ली की अदालत से मिली रिहाई, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और पीस बॉन्ड को लेकर चल रहा था कानूनी विवाद
नई दिल्ली, 22 अक्टूबर 2026। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को बुधवार को अदालत से रिहाई का आदेश मिलने के बाद देर रात जेल से रिहा कर दिया गया। दोनों नेताओं को दिल्ली के जंतर-मंतर पर निषेधाज्ञा के उल्लंघन के आरोप में हिरासत में लिया गया था। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।
दोनों नेताओं की रिहाई के बाद पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि सौरव और आशुतोष उनसे भी बड़े नेता हैं और वे अपने नेताओं के हर आदेश का पालन करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने अपने संदेश में कहा, “जान हाज़िर है!”
क्या है पूरा मामला?
इस मामले की शुरुआत 10 अक्टूबर को हुई थी। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, पार्टी के नेताओं ने बिना पुलिस अनुमति के सोशल मीडिया के माध्यम से जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। पुलिस को आशंका थी कि प्रदर्शन से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है।
इसी आधार पर पुलिस ने अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में लिया था। अगले दिन तीनों को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के सामने पेश किया गया। वहां उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 136 के तहत 50,000 रुपये के निजी मुचलके और जमानती बॉन्ड पर एक साल तक शांति बनाए रखने का वादा किया। इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था।
दोबारा हिरासत में क्यों भेजे गए?
पुलिस का दावा है कि रिहाई के बाद दोनों नेताओं ने फिर से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया। शिकायतकर्ता सब-इंस्पेक्टर मोहित भाटी ने अदालत को बताया कि 13 अक्टूबर को आशुतोष रांका और सौरव दास जेडीयू कार्यालय परिसर से निकलकर जंतर-मंतर पहुंचे और वहां नारेबाजी की।
इसके बाद दोनों नेताओं को दोबारा हिरासत में लेकर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। 19 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने उनकी हिरासत दो दिन के लिए बढ़ा दी थी।
अदालत ने अपने आदेश में शांति भंग होने की आशंका और पेश किए गए जमानतियों की पात्रता से जुड़े सवालों का उल्लेख किया था।
दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला
अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए दोनों नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने उनके वकीलों को पहले स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने होने वाली सुनवाई का इंतजार करने का सुझाव दिया।
इसके बाद बचाव पक्ष ने अपनी याचिका वापस ले ली। बुधवार को मजिस्ट्रेट की अदालत ने दोनों नेताओं के मुचलके स्वीकार करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया।
हालांकि, उनके वकीलों के अनुसार, हिरासत बढ़ाने के आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती भी दी गई थी। मामले में अदालत की ओर से आरोपों के गुण-दोष पर अंतिम निर्णय दिए जाने की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
बचाव पक्ष ने क्या कहा?
दोनों नेताओं के वकीलों ने पुलिस की कार्रवाई और पीस बॉन्ड के कथित उल्लंघन को लेकर सवाल उठाए। बचाव पक्ष का तर्क है कि मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करना अपने आप में पीस बॉन्ड का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि उल्लंघन के लिए सार्वजनिक शांति को खतरा होने जैसे पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है।
दूसरी ओर, पुलिस ने दावा किया कि प्रदर्शन के दोबारा आह्वान से कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका बनी हुई थी।
क्या होता है पीस बॉन्ड?
पीस बॉन्ड एक लिखित आश्वासन होता है, जिसके तहत संबंधित व्यक्ति निर्धारित अवधि तक शांति बनाए रखने और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वाली गतिविधियों से दूर रहने का वादा करता है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका के मामलों में ऐसे बॉन्ड की मांग कर सकते हैं। जमानतियों की पात्रता की जांच भी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है।
अभिजीत दीपके को पहले ही मिल चुकी थी रिहाई
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को इससे पहले शनिवार को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत से रिहाई मिल गई थी। उन्हें 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में प्रस्तावित ‘लहरा दो तिरंगा’ विरोध प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिया गया था।
सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई के बाद अब इस मामले में पुलिस के आरोपों, पीस बॉन्ड की शर्तों और विरोध प्रदर्शन से जुड़े कानूनी सवालों पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
स्रोत: बीबीसी न्यूज़ हिन्दी की रिपोर्ट।
नोट: यह समाचार उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर स्वतंत्र समाचार शैली में तैयार किया गया है। आरोपों और पुलिस के दावों को संबंधित पक्षों के दावे के रूप में प्रस्तुत किया गया है।


