

मुंबई: देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी समूहों में शामिल टाटा ग्रुप इस समय एक बड़े कॉरपोरेट गवर्नेंस विवाद के बीच है। विवाद के केंद्र में Tata Sons, Tata Trusts, चेयरमैन N. Chandrasekaran और संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग का मुद्दा है।
17 सितंबर 2026 को Tata Sons के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए Executive Chairman के रूप में फिर से नियुक्त करने को मंजूरी दी। इसी बैठक में कंपनी ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुरूप Tata Sons की संभावित लिस्टिंग की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला भी किया। दोनों फैसलों का Tata Trusts के चेयरमैन Noel Tata ने विरोध किया।
क्या Tata Group पर परिवार का नियंत्रण खत्म हो सकता है?
इस सवाल का जवाब फिलहाल सीधा “हां” या “नहीं” नहीं है।
टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी Tata Sons में लगभग 66 फीसदी हिस्सेदारी Tata Trusts के पास है। ये ट्रस्ट परोपकारी संस्थाएं हैं और इनकी संपत्तियां किसी एक परिवार के सदस्य की निजी संपत्ति के रूप में नहीं मानी जातीं।
यही कारण है कि मौजूदा विवाद को सीधे तौर पर “टाटा परिवार से कारोबार छिनने” का मामला कहना सही नहीं होगा। असल विवाद Tata Sons की governance, leadership और ownership structure को लेकर है।
N. Chandrasekaran के कार्यकाल पर क्यों हुआ विवाद?
एन. चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना था। अगस्त 2026 में उन्होंने Tata Sons के बोर्ड को बताया था कि वह अपने मौजूदा कार्यकाल के बाद दोबारा नियुक्ति की मांग नहीं करेंगे।
लेकिन सितंबर में बोर्ड ने उनसे अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा। इसके बाद 17 सितंबर की बैठक में बोर्ड ने उन्हें अगले पांच वर्षों के लिए फिर से Executive Chairman नियुक्त करने का फैसला किया।
इस प्रस्ताव पर मतदान में चार निदेशकों ने समर्थन किया, जबकि Noel Tata ने विरोध किया।
Tata Trusts का कहना है कि चंद्रशेखरन के दोबारा नियुक्त होने की प्रक्रिया Tata Sons के Articles of Association के अनुरूप नहीं थी। Trusts ने इस फैसले की वैधता पर भी सवाल उठाया है। दूसरी ओर, बोर्ड ने नियुक्ति को मंजूरी दे दी है।
Tata Sons की लिस्टिंग क्यों महत्वपूर्ण है?
विवाद का दूसरा बड़ा मुद्दा Tata Sons की संभावित IPO और stock-market listing है।
RBI ने 11 सितंबर 2026 को Tata Sons की Core Investment Company के रूप में अपनी registration surrender करने की अर्जी स्वीकार नहीं की। इसके बाद कंपनी के सामने RBI के Upper-Layer NBFC नियमों के तहत listing से जुड़े अनुपालन का सवाल फिर प्रमुख हो गया।
Tata Sons के बोर्ड ने अब RBI के नियमों के अनुरूप आगे की प्रक्रिया पर काम करने का फैसला किया है। हालांकि Tata Trusts का कहना है कि उसने Tata Sons की listing को मंजूरी नहीं दी है और उपलब्ध सभी विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।
Shapoorji Pallonji Group की भूमिका भी अहम
Tata Sons में Shapoorji Pallonji (SP) Group की करीब 18.4 फीसदी हिस्सेदारी है। SP Group लंबे समय से Tata Sons में अपनी हिस्सेदारी से liquidity हासिल करने की मांग करता रहा है और listing के पक्ष में रहा है।
Noel Tata ने बोर्ड के सामने SP Group की हिस्सेदारी के एक हिस्से को monetise करने का प्रस्ताव भी रखा है। रिपोर्टों के अनुसार, इस प्रस्ताव में करीब ₹25,000 करोड़ जुटाने की संभावना बताई गई है, जिससे तत्काल stock-market listing के बिना SP Group को liquidity उपलब्ध कराई जा सकती है।
क्या विवाद अदालत तक पहुंच सकता है?
Tata Trusts द्वारा Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति और बोर्ड प्रक्रिया पर आपत्ति जताए जाने के बाद कानूनी विवाद की संभावना भी बढ़ गई है।
Trusts का कहना है कि बोर्ड का फैसला Tata Sons के Articles of Association के अनुरूप नहीं है। दूसरी ओर, Tata Sons बोर्ड ने अपना फैसला पारित कर दिया है।
आगे चलकर shareholder approvals, Tata Sons की AGM और RBI के साथ होने वाली बातचीत इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल Tata Group के सामने मुख्य रूप से ये सवाल हैं:
- Tata Sons में Chandrasekaran की पांच साल की नई नियुक्ति किस तरह आगे बढ़ेगी?
- Tata Trusts की आपत्ति का क्या समाधान निकलेगा?
- Tata Sons RBI के listing-related नियमों का किस तरीके से पालन करेगा?
- क्या Tata Sons stock market में सूचीबद्ध होगी या कोई वैकल्पिक रास्ता निकलेगा?
- SP Group अपनी हिस्सेदारी को किस तरह monetise करेगा?
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल Tata Sons तक सीमित नहीं है। Tata Sons समूह की कई प्रमुख कंपनियों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखती है, इसलिए उसके governance और ownership से जुड़े फैसले पूरे Tata Group के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि टाटा परिवार का विशाल कारोबार उसके हाथ से निकल रहा है। मौजूदा स्थिति को Tata Sons में नियंत्रण, नेतृत्व, नियामकीय अनुपालन और ownership structure को लेकर चल रहे गंभीर विवाद के रूप में समझना अधिक उचित है।


