ईरान को पाकिस्तान पर भरोसा क्यों? जानिए अमेरिका और सऊदी अरब का पूरा समीकरण

Iran–Pakistan Diplomatic Handshake Montage

ईरान को पाकिस्तान पर भरोसा क्यों? अमेरिका और सऊदी से करीबी के बावजूद तेहरान के लिए क्यों अहम है इस्लामाबाद

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच पाकिस्तान बना अहम मध्यस्थ। साझा सीमा, सुरक्षा हित और अमेरिका तक पहुंच जैसे कारणों से तेहरान इस्लामाबाद के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। हालांकि, सऊदी अरब और अमेरिका से पाकिस्तान की नजदीकी दोनों देशों के बीच अविश्वास भी बढ़ाती है।

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर कूटनीतिक चर्चा के केंद्र में है। ईरान पर अमेरिका और इसराइल की ओर से संभावित हमलों की आशंकाओं के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के वरिष्ठ अधिकारियों की तेहरान में ईरानी नेतृत्व से मुलाकात हुई। इन बैठकों का उद्देश्य तनाव कम करना और बातचीत का रास्ता तलाशना बताया गया है।

सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि अमेरिका और सऊदी अरब के साथ करीबी संबंध रखने वाले पाकिस्तान पर ईरान भरोसा क्यों करता है? इसकी वजह दोनों देशों की साझा सीमा, सुरक्षा संबंधी जरूरतें, ऐतिहासिक सहयोग और अमेरिका के साथ संवाद स्थापित करने में पाकिस्तान की भूमिका है।

पाकिस्तान को तीनों देशों की जरूरत

पाकिस्तान के लिए ईरान, सऊदी अरब और अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखना रणनीतिक मजबूरी भी है।

  • सऊदी अरब: पाकिस्तान को आर्थिक सहायता और वहां काम करने वाले लाखों पाकिस्तानी नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर मिलते हैं।
  • अमेरिका: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के साथ पाकिस्तान के संबंधों में अमेरिका की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
  • ईरान: दोनों देशों के बीच साझा सीमा है। बलूचिस्तान क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग और सीमा पार गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए आपसी तालमेल जरूरी है।

यदि पाकिस्तान के ईरान के साथ संबंध बिगड़ते हैं, तो उसकी क्षेत्रीय और आर्थिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि इस्लामाबाद किसी एक पक्ष का खुलकर विरोध करने से बचने की कोशिश करता है।

ऊर्जा और व्यापार भी हैं अहम कारण

ईरान और पाकिस्तान के संबंधों में ऊर्जा सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। दोनों देशों के बीच व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान के साथ व्यापार बंद होने के बाद पाकिस्तान में एलपीजी सिलिंडर की कीमत बढ़कर लगभग 4,500 पाकिस्तानी रुपये हो गई थी। हालांकि, इस कीमत और आपूर्ति पर असर की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

पाकिस्तान पहले से ही अपने कुछ पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में ईरान के साथ तनाव बढ़ना उसकी क्षेत्रीय स्थिति को और कठिन बना सकता है।

पाकिस्तान की शिया आबादी भी महत्वपूर्ण

पाकिस्तान की आबादी में शिया मुसलमानों की उल्लेखनीय हिस्सेदारी है। ईरान दुनिया भर के कई शिया मुसलमानों के लिए धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। हर साल बड़ी संख्या में जायरीन ईरान जाते हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा सकते हैं। अतीत में ईरान और सऊदी अरब की क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता का असर पाकिस्तान के भीतर भी देखने को मिला है।

इसलिए ईरान के साथ संवाद बनाए रखना पाकिस्तान की घरेलू स्थिरता और क्षेत्रीय नीति, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

अमेरिका तक पहुंचने में पाकिस्तान की भूमिका

ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान दोनों देशों के बीच संपर्क का माध्यम बनने की क्षमता रखता है।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में ईरान की आधिकारिक राजनयिक मौजूदगी से जुड़े मामलों में भी पाकिस्तान की लंबे समय से भूमिका रही है। इससे इस्लामाबाद को ऐसा संपर्क माध्यम बनने का अवसर मिलता है, जिसके जरिए तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा सकती है।

अमेरिका को ऐसे मध्यस्थ की जरूरत हो सकती है, जिससे ईरान बातचीत करने के लिए तैयार हो। वहीं, सऊदी अरब को भी पाकिस्तान के माध्यम से तेहरान के साथ संपर्क बनाए रखने का अवसर मिलता है।

सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंध, लेकिन ईरान से दूरी नहीं

पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सऊदी अरब के साथ अपने सुरक्षा संबंधों और ईरान के साथ पड़ोसी के रिश्ते में संतुलन बनाए रखना है।

2015 में पाकिस्तान की संसद ने यमन युद्ध में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में शामिल होने से इनकार किया था, हालांकि सऊदी क्षेत्र की रक्षा के समर्थन की बात कही गई थी। इस फैसले को ईरान के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

पाकिस्तान ईरान और खाड़ी देशों पर होने वाले हमलों की निंदा करते हुए बातचीत की अपील करता रहा है। इससे उसे क्षेत्र के अलग-अलग पक्षों के साथ संपर्क बनाए रखने में मदद मिलती है।

लेकिन यह संतुलन हमेशा आसान नहीं रहता। यदि पाकिस्तान की सैन्य भूमिका खाड़ी क्षेत्र में अधिक सक्रिय होती है, तो ईरान के लिए उसकी निष्पक्षता पर भरोसा करना मुश्किल हो सकता है।

इतिहास में भी रहे हैं उतार-चढ़ाव

1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद ईरान शुरुआती मान्यता देने वाले देशों में शामिल था। 1950 में दोनों देशों ने मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए। शीत युद्ध के दौरान भी दोनों देशों के बीच करीबी सहयोग रहा।

हालांकि, 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद क्षेत्रीय समीकरण बदलने लगे। पाकिस्तान के सऊदी अरब और अमेरिका के साथ संबंध, अफगानिस्तान को लेकर अलग-अलग रणनीतियां और सीमा सुरक्षा से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के बीच अविश्वास की वजह बने।

1990 के दशक में तालिबान और अफगानिस्तान को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग रुख ने तनाव बढ़ाया। बाद के वर्षों में सीमा पार उग्रवादी गतिविधियों को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आए।

जनवरी 2024 में ईरान और पाकिस्तान के बीच सीमा पार हमलों के बाद तनाव बढ़ा था, लेकिन दोनों देशों ने जल्द ही संबंध सामान्य करने और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए।

क्या पाकिस्तान निष्पक्ष मध्यस्थ बना रह पाएगा?

पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका के सामने सबसे बड़ा सवाल उसकी वास्तविक तटस्थता को लेकर है। एक ओर उसके सऊदी अरब और अमेरिका के साथ मजबूत संबंध हैं, दूसरी ओर ईरान के साथ पड़ोसी और सुरक्षा साझेदार के रूप में सहयोग जरूरी है।

विश्लेषकों का मानना है कि जितनी अधिक सुरक्षा प्रतिबद्धताएं पाकिस्तान स्वीकार करेगा, किसी संकट के समय उसके लिए सभी पक्षों को संतुष्ट रखना उतना ही कठिन होगा।

ईरान के साथ सीमा विवाद, बलूचिस्तान में सक्रिय उग्रवादी संगठनों और खाड़ी देशों के साथ पाकिस्तान के रक्षा संबंधों से जुड़े मुद्दे इस संतुलन की परीक्षा लेते रहेंगे।

निष्कर्ष: जरूरत और रणनीति पर टिका है भरोसा

ईरान का पाकिस्तान पर भरोसा पूरी तरह अटूट नहीं है। यह साझा हितों, ऐतिहासिक सहयोग और कूटनीतिक जरूरतों पर आधारित है। पाकिस्तान ईरान के लिए अमेरिका तक संवाद का माध्यम बन सकता है, जबकि इस्लामाबाद के लिए तेहरान के साथ अच्छे संबंध क्षेत्रीय सुरक्षा और ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

फिलहाल पाकिस्तान की कोशिश है कि वह सऊदी अरब और अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखते हुए ईरान के साथ टकराव से बचा रहे। लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की स्थिति में इस संतुलन को बनाए रखना उसके लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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