
SIR पर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का जवाब: ‘फैसले ज्ञानेश कुमार ने अकेले नहीं लिए’, सर्वसम्मति से निर्णय का दावा
नई दिल्ली। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठे विवाद के बीच भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि इस प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अकेले नहीं लिए, बल्कि आयोग ने इन्हें सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। आयोग ने उन आरोपों को खारिज किया है, जिनमें दावा किया गया था कि अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद फैसले लिए गए।
यह हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज और एसआईआर से जुड़े फैसलों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है। मामले में सुप्रीम कोर्ट को अब यह देखना है कि संबंधित फैसले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप लिए गए थे या नहीं।
तीन अहम आदेशों पर आयोग की सफाई
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए आदेश सर्वसम्मति से लिए गए फैसले थे। आयोग के मुताबिक, हलफनामे को मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने मंजूरी दी है।
यह जवाब उस रिपोर्ट के बाद उठे विवाद के बीच आया है, जिसमें दावा किया गया था कि एसआईआर से संबंधित 14 अहम फैसलों पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्तियां दर्ज की थीं।
हालांकि, आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि याचिका मुख्य रूप से एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित है और याचिकाकर्ता ने उसमें किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की है।
फैसले लेने की प्रक्रिया पर क्या कहा?
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी फाइल पर अधिकारियों या चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई टिप्पणियां, सवाल और सुझाव अपने आप में आयोग के अंतिम फैसले नहीं होते।
आयोग के अनुसार, सामान्य प्रक्रिया में फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त के पास जाती है, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त के पास और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत की जाती है।
आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का हवाला देते हुए कहा कि फैसले जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए। यदि सर्वसम्मति नहीं बनती, तो कानून के मुताबिक बहुमत से फैसला किया जा सकता है।
फॉर्म-6 में बदलाव के आरोप से भी इनकार
एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में बदलाव किए जाने के आरोपों पर भी चुनाव आयोग ने सफाई दी है। आयोग का कहना है कि निर्धारित फॉर्म में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और आयोग ने फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया।
आयोग के अनुसार, एसआईआर के दौरान आवेदकों से पुरानी मतदाता सूचियों से अपने या अपने परिवार के संबंध की जानकारी देने के लिए जो घोषणा-पत्र मांगा गया, वह अलग दस्तावेज है। इसे फॉर्म-6 में संशोधन नहीं माना जा सकता।
हालांकि, आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्लेटफॉर्म पर घोषणा-पत्र को जिस तरीके से प्रदर्शित किया गया, उससे यह धारणा बन सकती थी कि फॉर्म में बदलाव हुआ है। आयोग ने कहा कि इसका उद्देश्य आवेदकों को पुरानी मतदाता सूचियों से जोड़ने में मदद करना था।
मतदाताओं की सुनवाई को लेकर भी दी जानकारी
चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाताओं की सुविधा को लेकर कहा कि जिन मतदाताओं के नाम पुरानी मतदाता सूचियों से नहीं जोड़े जा सके हैं, उन्हें आम तौर पर व्यक्तिगत सुनवाई के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी।
आयोग के मुताबिक, बूथ लेवल अधिकारी ऐसे मतदाताओं के घर जाकर आवश्यक दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं और उन्हें चुनावी पंजीकरण अधिकारी के विचार के लिए ECINet प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर सकते हैं। असाधारण परिस्थितियों में सुनवाई की जरूरत पड़ सकती है और जहां तक संभव हो, इसे ऑनलाइन आयोजित किया जाना चाहिए।
विपक्ष की याचिकाओं में क्या आरोप हैं?
इस मामले में दाखिल याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसले पूरे चुनाव आयोग की सहमति के बिना लिए गए। याचिकाकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और फैसलों की वैधता पर सवाल उठाए हैं।
बाद में राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्षी इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं की ओर से भी याचिका दाखिल की गई। उसमें भी आरोप लगाया गया कि आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना किया गया।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों का विरोध करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने की मांग को सुनवाई योग्य नहीं बताया। आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए वही प्रक्रिया और आधार लागू होते हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए निर्धारित हैं।
27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा था। अदालत ने उस समय ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर काम करने से रोकने की अंतरिम मांग स्वीकार नहीं की थी।
अब इस मामले में अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष होनी है। अदालत ने पहले कहा था कि वह फैसलों की वैधता की जांच करेगी और यदि कोई फैसला कानून के अनुरूप नहीं पाया जाता है, तो उचित कार्रवाई की जा सकती है।
फिलहाल चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में एसआईआर से जुड़े फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताते हुए अपना पक्ष रखा है। मामले में अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आगे आने वाले आदेशों से स्पष्ट होगी।


